मरते समय मुख में गंगाजल, तुलसी और सोना क्यों रखा जाता है? गरुड़ पुराण अनुसार अंतिम मुख-शुद्धि का रहस्य
सनातन हिंदू वैदिक परंपरा में मनुष्य के जीवन के हर पड़ाव को संस्कारों से बांधा गया है। जन्म से लेकर देहावसान तक कुल 16 संस्कारों का विधान है। जब कोई व्यक्ति अपने जीवन की अंतिम दहलीज पर पहुंचता है और उसकी सांसें उखड़ने लगती हैं, तो परिवार के सभी सदस्य उसके समीप एकत्रित होते हैं। उस अत्यंत संवेदनशील और भावुक क्षण में एक प्राचीन अनुष्ठान निभाया जाता है—मरणासन्न व्यक्ति के मुख में गंगाजल की कुछ बूंदें, एक हरा तुलसी का पत्ता और सोने का एक सूक्ष्म कण (सुवर्ण) रखना।
आज की युवा पीढ़ी इसे केवल एक पुरानी परंपरा मान सकती है, परंतु हमारे ऋषियों और गरुड़ पुराण में इस विधान को ‘मुख-शुद्धि’ और ‘कर्ण-कवच’ कहा गया है। यह केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवात्मा के शांतिपूर्ण प्रस्थान का गहन आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और जैविक विज्ञान है।
लास्ट राइड फ्यूनरल (Last Ride Funeral) दिल्ली-एनसीआर में परिवारों को इन सनातन मर्यादाओं के साथ गरिमापूर्ण विदाई सेवाएं उपलब्ध कराती है। आइए समझते हैं कि अंतिम समय में मुख में इन तीन पवित्र वस्तुओं को रखने का वास्तविक रहस्य क्या है।
1. गरुड़ पुराण का प्रमाण: अंतिम समय का महामंत्र
गरुड़ पुराण (प्रेत कल्प, द्वितीय अध्याय) में भगवान श्रीहरि विष्णु स्वयं पक्षीराज गरुड़ से कहते हैं:
“मुखे सुवर्णं निक्षिप्य गङ्गातोयं च पावनम् । तुलसीदलमथाधाय मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥”
(अर्थात: प्राण त्यागते समय जिसके मुख में शुद्ध सुवर्ण, पवित्र गंगाजल और तुलसी का पत्ता रखा जाता है, वह जीवात्मा अपने समस्त पापों और कर्म-बंधनों से मुक्त होकर परमगति को प्राप्त होती है।)
मानव शरीर में मुख ही वह मुख्य द्वार है जिसके माध्यम से मनुष्य जीवन भर वाणी का प्रयोग करता है, अन्न ग्रहण करता है और श्वास लेता है। मृत्यु के समय इसी द्वार को परम पवित्र तत्वों से अभिमंत्रित किया जाता है ताकि आत्मा का अंतिम निकास किसी भी अशुद्धि से रहित हो।
2. मुख में सोना (सुवर्ण) रखने का रहस्य
सोने को केवल एक मूल्यवान धातु नहीं, बल्कि वैदिक दर्शन में साक्षात अग्नि देव का वीर्य (अग्नेरेव हिरण्यम्) माना गया है।
- अविनाशी और अशुद्धि-रहित तत्व: संसार की सभी धातुएं (लोहा, तांबा, चांदी) समय के साथ जंग खाती हैं, काली पड़ती हैं या सड़ती हैं, लेकिन शुद्ध सोना कभी विकृत या अपवित्र नहीं होता। मनुष्य ने जीवन भर अपनी वाणी से जाने-अनजाने जो भी असत्य, कटु वचन या पाप किए हों, अग्नि-स्वरूप सोना मुख में रखने से वे वाचिक दोष भस्म हो जाते हैं।
- सूक्ष्म ऊर्जा का ऊर्ध्वगामी प्रवाह: सोना अत्यंत चुंबकीय और ऊर्जा संवाहक धातु है। योग शास्त्र के अनुसार, मृत्यु के समय मुख में स्वर्ण रखने से प्राण निचले द्वारों (गुदा, जननांग) की ओर न जाकर कंठ (विशुद्ध चक्र) और ब्रह्मरंध्र की ओर खिंचते हैं, जिससे आत्मा की ऊर्ध्वगति सुनिश्चित होती है।
- यमदूतों के भय से मुक्ति: शास्त्रों में वर्णित है कि जिस देह में स्वर्ण की उपस्थिति होती है, वहां नकारात्मक ऊर्जाएं और यम के दूत जीवात्मा को भयभीत नहीं कर पाते।
3. तुलसी दल का महत्व: बैकुंठ का पावन पासपोर्ट
तुलसी को भगवान विष्णु की परम प्रिया ‘वृंदा’ का साक्षात स्वरूप माना गया है।
- दैवीय सुरक्षा चक्र: स्कंद पुराण के अनुसार, जिस स्थान पर तुलसी की गंध और उपस्थिति होती है, वहां यमदूत प्रवेश नहीं कर सकते। तुलसी का पत्ता मुख पर रखने से मरणासन्न आत्मा को मृत्यु के समय होने वाले भयानक आभासों और भय से मुक्ति मिलती है और उसे नारायण के बैकुंठ धाम का आश्रय प्राप्त होता है।
- वैज्ञानिक एवं चिकित्सीय कारण: मृत्यु से ठीक पहले व्यक्ति के गले में कफ जम जाता है और श्वास नली में घड़घड़ाहट (Death Rattle) होने लगती है। तुलसी के पत्ते में मौजूद यूजेनॉल (Eugenol) और वाष्पशील तेल श्वास नलिका को शांत करते हैं, मुख की दुर्गंध को रोकते हैं और व्यक्ति को अंतिम समय में शांति प्रदान करते हैं।
4. गंगाजल का अर्पण: सांसारिक प्यास और कर्मों की मुक्ति
गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि शिव के मस्तक से अवतरित हुई मोक्षदायिनी सुरसरि हैं।
- मरते समय की प्रचंड प्यास को शांत करना: जैविक दृष्टि से मृत्यु से पूर्व शरीर में जल तत्व का तेजी से ह्रास होता है। जीभ तालू से चिपक जाती है और गला पूरी तरह सूख जाता है। उस समय चांदी की चम्मच या तुलसी दल से टपकाई गई गंगाजल की बूंदें व्यक्ति की शारीरिक प्यास को तृप्त करती हैं, जिससे वह तड़पने के बजाय शांत चित्त से देह त्यागता है।
- कर्मों का क्षालन: जिस प्रकार शिशु का जीवन मां के दूध से प्रारंभ होता है, उसी प्रकार हिंदू का सांसारिक जीवन मोक्षदायिनी मां गंगा के जल से संपन्न होता है। गंगाजल समस्त मानसिक संतापों और संचित पापों को धोकर आत्मा को पवित्र करता है।
5. शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक तुलनात्मक तालिका
| पावन तत्व | वैदिक व पौराणिक विधान | जैविक एवं मनोवैज्ञानिक प्रभाव |
|---|---|---|
| सोना (सुवर्ण) | अग्नि तत्व का प्रतीक; वाणी के समस्त दोषों का शमन; ऊर्ध्वगति में सहायक। | रासायनिक रूप से निष्क्रिय; किसी प्रकार का विषैला प्रभाव नहीं; परिवार को शांति। |
| तुलसी दल | वृंदा देवी का स्वरूप; यम भय निवारक; बैकुंठ धाम का पाथ्य (मार्ग-संपादक)। | प्राकृतिक एंटीसेप्टिक; यूजेनॉल द्वारा कफ और श्वास कष्ट का शमन। |
| गंगाजल | शिव-जटा से प्रवाहित अमृत; जन्म-जन्मांतर के कर्म-बंधनों का विमोचन। | निर्जलीकरण (Dehydration) से सूखे कंठ को तर करना; शांतिपूर्ण अंतिम श्वास। |
6. यह रस्म निभाते समय किन बातों की सावधानी रखें?
मृत्यु के अंतिम पलों में परिजनों को अत्यंत धैर्य और संवेदनशीलता बरतनी चाहिए:
– जबरन पानी न उंडेलें: जब व्यक्ति अचेत हो, तो उसके गले में अधिक मात्रा में जल कभी न डालें, इससे जल फेफड़ों में जाकर दम घुटने (Aspiration) का खतरा हो सकता है। केवल 2-3 बूंदें चम्मच या तुलसी के पत्ते से होंठों और जीभ पर लगाएं।
– छोटा और सुरक्षित स्वर्ण कण: सोने की भारी अंगूठी या सिक्का गले में न डालें, जिससे सांस रुकने का भय हो। केवल एक छोटा तार या सोने का पत्तर रखें, या गंगाजल में सोने की अंगूठी स्पर्श कराकर वह जल अर्पित करें।
– कर्ण मंत्र का उच्चारण: गंगाजल और तुलसी अर्पित करते समय मरणासन्न व्यक्ति के दाएं कान में “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”, “हरे राम”, या “महामृत्युंजय मंत्र” का धीमे स्वर में जाप करें।
अंतिम यात्रा की गरिमापूर्ण तैयारी
जैसे ही जीवात्मा देह त्यागती है, शरीर ‘जीव’ से ‘शव’ में परिवर्तित हो जाता है। इसके पश्चात अंतेष्टि संस्कार और वैदिक दाह संस्कार की विधियां प्रारंभ होती हैं।
दिल्ली-एनसीआर में किसी भी समय वैदिक पंडित, शव वाहन, फ्रीजर बॉक्स या श्मशान घाट समन्वय के लिए लास्ट राइड फ्यूनरल 24 घंटे शोकाकुल परिवारों के साथ सेवा भाव से उपस्थित है:
- 24/7 हेल्पलाइन: +91 92171 79989
- आधिकारिक वेबसाइट: https://lastridefuneral.in/
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: मरते समय मुख में सोना रखने का मुख्य धार्मिक कारण क्या है?
उत्तर: गरुड़ पुराण अनुसार सोना साक्षात अग्नि का स्वरूप है। मुख में सोना रखने से मनुष्य द्वारा जीवन भर बोली गई कटु वाणी और पाप भस्म हो जाते हैं, और आत्मा को ऊर्ध्व लोकों में गमन करने की पवित्र ऊर्जा मिलती है।
प्रश्न 2: यदि उस समय सोना उपलब्ध न हो तो क्या करें?
उत्तर: यदि उस समय सोने का छोटा टुकड़ा उपलब्ध न हो, तो परिवार में मौजूद किसी भी शुद्ध सोने की अंगूठी या आभूषण को गंगाजल में स्पर्श कराकर उस अभिमंत्रित गंगाजल को मुख में लगाना शास्त्रों में मान्य है।
प्रश्न 3: तुलसी का पत्ता मुख में क्यों रखा जाता है?
उत्तर: तुलसी भगवान विष्णु की परम प्रिया हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार तुलसी की उपस्थिति से यम के दूत आत्मा को कष्ट नहीं पहुंचाते, और जीवात्मा को बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त तुलसी के प्राकृतिक गुण गले के कफ को शांत करते हैं।
प्रश्न 4: क्या मरणासन्न व्यक्ति को बहुत सारा गंगाजल पिलाना चाहिए?
उत्तर: नहीं। अंतिम समय में निगलने की क्षमता क्षीण हो जाती है। अधिक पानी डालने से श्वास नली अवरुद्ध हो सकती है। अतः तुलसी दल या छोटी चम्मच से केवल 2 से 3 बूंदें ही होंठों और जीभ पर लगानी चाहिए।
प्रश्न 5: क्या यह रस्म अस्पताल के आईसीयू में भी की जा सकती है?
उत्तर: हां। अधिकांश अस्पतालों में डॉक्टर अंतिम समय में परिजनों को कुछ क्षण की अनुमति देते हैं। उस समय तुलसी दल और गंगाजल की बूंदें होंठों पर लगाकर परिजन यह शास्त्रीय कर्तव्य शांतिपूर्वक निभा सकते हैं।
प्रश्न 6: मुख-शुद्धि कराते समय परिजनों को क्या बोलना चाहिए?
उत्तर: उस समय रोने या विलाप करने के बजाय व्यक्ति के दाएं कान में महामृत्युंजय मंत्र, गायत्री मंत्र, भगवद्गीता के श्लोक या नारायण/राम नाम का शांत स्वर में उच्चारण करना चाहिए।
प्रश्न 7: गंगाजल उपलब्ध न होने पर किस जल का उपयोग करें?
उत्तर: यदि गंगाजल उपलब्ध न हो, तो स्वच्छ जल में तुलसी दल डालकर और गायत्री मंत्र पढ़कर अभिमंत्रित जल, अथवा यमुना, नर्मदा, गोदावरी जैसी पवित्र नदियों का जल अर्पित किया जा सकता है।
प्रश्न 8: प्राण निकलने के तुरंत बाद परिजनों को क्या करना चाहिए?
उत्तर: प्राण त्यागने के तुरंत बाद मृतक के नेत्र और मुख बंद करें, शरीर के अंगों को सीधा लिटाएं, सिरहाने एक शुद्ध घी का दीपक जलाएं और 24/7 फ्यूनरल हेल्पलाइन 9217179989 पर संपर्क कर शव वाहन और अंतिम संस्कार की व्यवस्था प्रारंभ करें।
